Homosexuality and Bharat

पाश्चात्य संस्कृति के अनुसार सेक्स का आनंद ही चरम आनंद है.. भारतीय संस्कृति का मूल आधार हमेशा ईश्वर, ध्यान (Meditation) और मोक्ष प्राप्ति रहे..

ध्यान की इन ऊँचाइयों का ही परिणाम था की हम पुनर्जनम को समझ पाए.

इस पावन  धरती पर ही राम, कृष्ण, बुध, महावीर, मीरा, कबीर, ओशो, परमहंस, विवेकानंद जैसी महान आत्माएं यहाँ आई और इसका गौरव बढ़ाया.

परिवार का मूल्य भी पाश्चात्य संस्कृति नहीं समझा पायी वह उसका आधार भी बहुत ही कमज़ोर रहा.. हमने कभी अपने बच्चे पैदा करने के बाद सड़कों पर न ही छोड़े और न ही हमें कभी कॉन्वेंट सोसाइटी की स्थापना करने की ज़रूरत पड़ी..

इसीलिए जीवन को चार भागों में भी बांटा गया.. ब्रहमचर्य.. गृहस्थ.. वानप्रस्थ.. वह संन्यास ..

गीत नृत्य नाटक जीवन में साधन प्रभु की और जाने के थे.. न की सेक्स दर्शन के.

अब पाश्चात्य संस्कृति के अनुसार उन्हें जीवन एक बार ही मिला है… (पुनर्जनम का कोई कांसेप्ट नहीं है) और इसी जन्म में भी सब कुछ पूरा होना चाहिए..  अब मनुष्य की मानसिकता की यह कमी है की उसे हमेशा नयापन चाहिए.. अब क्यूंकि वह इश्वर, मोक्ष पुनर्जनम जैसे विषयों में नयापन नहीं ला पाते.. तो वह सेक्स में ही नयापन ढूँढ़ते हैं.. एक ही जीवन का उद्देश्य बचा.. इसीलिए दिमाग वहीँ अटक कर रह गया.. इसी निकृष्ट सोच का नतीजा था.. समलैंगिकता या homosexuality..

क्या आपने या आपके माता पिता वह उनके पूर्वजों ने कभी ऐसी व्यवस्था की इच्छा करी? नहीं क्यूंकि ऐसी कभी हमारे समाज में इसके लिए इच्छा ही नहीं रही..

हमारे देश पर हज़ारों वर्षों तक राज़ हुआ.. मगर हमारे देश में हिंदुओं की संख्या बनी रही वह सांप्रदायिक सौहार्द बड़े रूप से व्यापक रहा.. इसका मूल कारण हमारी संस्कृति थी.. सारे जगत में धर्म परिवर्तन हो गए.. पूरी दुनिया ईसाई या मुस्लमान धर्म की तरफ बढ़ी.. यहाँ भी चाहे वेटीकन द्वारा कितने ही धरम परिवर्तन हुए हों.. मगर हम बचे क्यूंकि हमारी संस्कृति में हमारी जड़ें बहुत अंदर तक रमी हुई हैं.

आज यह प्रहार मीडिया (सिनेमा प्रिंट और समाचार) के द्वारा हमारी मानसिकता पर हो रहा है.. आपको जानकारी नहीं होगी.. पर सम्पूर्ण जगत का मीडिया कुछ ही कॉर्पोरेट कंपनियों के हाथ में है.. बॉलीवुड में भी बड़े बड़े प्रोडूसर अपनी कंपनियों के सम्पूर्ण मालिक नहीं हैं वह बहुत विदेशी निवेश उनमें है जो की सारा कंटेंट तय करता है.. ‘दोस्ताना’ ‘ देसी बोय्ज़’ जैसी फिल्में उसी सोच की उपज हैं.

Section 377 जैसे घटिया कानून भी विदेशी प्रभाव में हमारे मुर्ख नेता पास करवाते हैं..

अब इसका मूल उद्देश्य एक तो हमारी संस्कृति पर प्रहार है.. और दूसरा एक बढ़ा संभावित बाजार है.. जो की इस ट्रेंड के चल निकलने पर योरोप और अमरीका के बाजार से भी बड़ा होगा. इन फ़ालतू विषयों पर बहस भी जनमानस को समय खराब लगना चाहिए.

युवा भारत का अमूल्य समय अब सेक्स बॉलीवुड और क्रिकेट में नष्ट करवाया जा रहा है.. जो की सब एक ‘मार्केट’ या बाजार के लिए ही है.

इस समझ के साथ अब चुनाव आपका है की आप अपने बच्चों को रामकृष्ण परमहंस, ओशो, बुद्ध, महावीर, पंचतंत्र की सोच का पठन कराएं या.. पाश्चात्य की नक़ल में चिकनी चमेली.. मुन्नी बाई.. शीला की जवानी.. जलेबी बाई.. दोस्ताना.. पर नचाएं..

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